सोमवार, जनवरी 17, 2022

जीवन यात्रा की एक कड़ी - मनीष कुमार सिन्हा

मेरा तकिया कलाम है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी ख़ुशी है वो मेरे दोस्तों की वजह से है. मित्र जीवन के ऊर्जा स्रोत मालूम पड़ते हैं मुझे. मित्रों ने लगभग हर क़दम पर उत्साह बढ़ाया है, मुझ जैसे निराशावादी(कॉलेज में दोस्तों ने मेरा नाम "दुखी आत्मा" रखा था) के आशावादिता में वृद्धि की है. 

उन्ही मित्रों में से एक नाम है - मनीष कुमार सिन्हा. हाई स्कूल के मित्रों की बात ही अलग होती है, मनीष उनमे से एक है. अटल बिहारी सिंह हाई स्कूल तब एक जानी मानी सरकारी स्कूल थी जिसमे किसी किसी साल शत प्रतिशत छात्र बोर्ड में पास होते थे. एक ही कक्षा के सैकड़ों छात्रों के बीच मनीष से दोस्ती कैसे हुई मुझे याद नहीं। शायद हम एक ही मोहल्ले में रहते थे वो एक कारण हो. हमलोग 1993 में हाई स्कूल पास किये. उसके बाद मैं सेंट्रल हिन्दू स्कूल बनारस आ गया. फिर भी भभुआ आना जाना लगा रहा और मनीष का साथ बना रहा. 1995 में हम पटना गए थे. फिर उसके पापा का ट्रांसफर हो गया और उसे भभुआ छोड़ना पड़ा. 

मनीष मेरा राज़दार था. हर सुख-दुःख का, गिले-शिकवे का, हर्ष-विषाद का, अवसाद का, प्रेम का, आनंद का. सरस्वती पूजा के दिन विभिन्न स्कूलों में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अक्सर हम दर्शक होते। हर शाम हवाई अड्डा घूमना नित कर्म में शामिल था. और अनगिनत बातें जो अब याद भी नहीं हैं. हाँ उस साथ के मिठास और उस मिठास-मिश्रित आनंद की अनुभूति अभी है.  

1996 के बाद पहली मुलाकात हुई दिसंबर 2020 में यानि लगभग 24 साल बाद. इन 24 सालों में मैंने लगभग हर रोज़ मनीष को याद किया होगा. वैसे भी मैं एक अतीतजीवी मनुष्य हूँ. अपने किसी भी पुराने स्कूल के दोस्तों से मिलता तो मनीष के बारे पूछता. तब फ़ोन नंबर जैसी चीज़ की कल्पना भी कम से कम हम तो नहीं करते थे. सभी दोस्त यही बोलते कुछ पता नहीं. जय प्रकाश तिवारी से होने वाली लगभग हर मुलाकात में मनीष एक बार ज़रूर आता. हर रोज़ यादों का सिलसिला तो चलता ही रहा लेकिन असल खोज शुरू हुई 2004 में जब मैंने पहली नौकरी पायी. आर्थिक स्थिरता जब आती है तो सबसे पहले पुराने दोस्त याद आते हैं, ऐसा मुझे लगता है. चूँकि मैं सॉफ्टवेयर फील्ड में था तो इंटरनेट का उपयोग हमेशा ही होने लगा. इंटरनेट के मायाबी संसार में भी खोज शुरू हो गयी. ऑरकुट (orkut) पर जब लॉगिन बनाया तो सबसे पहले मनीष को सर्च किया. मनीष तो नहीं मिला लेकिन इसी क्रम में हमारे एक और मित्र आनंद सिंह मिल गए, जिन्होंने फोटो तो अभिषेक बच्चन का लगाया था लेकिन शहर का नाम भभुआ लिखने का मोह वो नहीं छोड़ पाए थे. मैंने कमेंट करते पूछा कहाँ घर है आपका भभुआ में.जब उन्होंने रूपावली सिनेमा के सामने बताया तो पक्का हो गया ये वही आनंद भाई हैं. फिर नंबर का आदान प्रदान हुआ. ये भी पता चला कि वो नॉएडा में ही रहते हैं. फिर मुलाकातों का सिलसिला शरू हुआ. धन्यवाद ऑरकुट का.

मुलाकात के बाद पहला सवाल आनंद भाई से यही था "मनीष क कुछ अता पता बा हो?"

मनीष का पता नहीं मालूम था सिर्फ इतना पता कि वो नवादा का रहने वाला था. भभुआ में जहाँ वो किराये पर रहता था, उस घर के मकानमालिक के बेटे से एक बार जाकर पूछा मनीष का कोई पता ठिकाना है लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी. वैसे भी किरायेदारों को कौन याद रखता है. खुद हम नहीं रखते. लेकिन तब ज़माना अलग था. किरायेदारों से भी सम्बन्ध घर जैसे ही होते थे इसका गवाह खुद मनीष भी है. 

मनीष एक टाइपिंग इंस्टिट्यूट में टाइपिंग सीखता था. एक बार उसके टीचर से भी मिला और वही सवाल किया. उनको मनीष तो याद आया, लेकिन पता बताने में असमर्थता ज़ाहिर की. लेकिन इतना ज़रूर बोले मनीष के पापा के ऑफिस में जाकर उनका स्थायी पता पूछ लो. हालाँकि यह काम आसान नहीं था. कोई भी सरकारी दफ़्तर अपने किसी पुराने कर्मचारी का डिटेल किसी और को क्यों शेयर करेगा. शायद यह गोपनीयता के ख़िलाफ़ भी हो.

फिर सोचा स्कूल चलता हूँ, स्कूल के एडमिशन रजिस्टर में उसका स्थायी पता होगा. पता लेकर गाँव चला जाऊंगा जहाँ से उसका वर्तमान पता चल जायेगा. हालाँकि इसमें भी वही दिक्कत थी जो की ऑफिस में थी. फिर हमारे समय के सभी शिक्षक वहां से जा चुके थे इसलिए भी पता मिलना मुश्किल ही था. 

इंटरनेट खंगाल मारा। बिहार,यू पी और केंद्र के बहुत सारे प्रतियोगी परीक्षाओं के रिजल्ट देखता था इस उम्मीद में कि शायद मनीष और नवादा एक साथ दिख जाय. आपको लगेगा की यह पागलपन था लेकिन इसी क्रम में मेरे एक मित्र का पता चला कि उसका चयन यू पी में शिक्षक पर हो गया है. एक और घनिष्ट के बारे में पता चला कि वो जौनपुर से बीएड कर रहा है.    

classmates.com पर अटल बिहारी स्कूल के मेंबर्स देखता था. इस दौरान भी एक दो मित्रों से मुलाकात हुई. भोजपुरिआ.कॉम भी देखता था शायद कहीं मनीष दिख जाय. मनीष तो नहीं मिला लकिन हमारा पडोसी शशांक मिल गया. बाद में बताऊंगा कि शशांक की वजह से ही मनीष का पता चला. तो सबसे बढ़ा धन्यवाद भोजपुरिआ.कॉम का.मैं इस वेबसाइट का यूजर नहीं हूँ न था लेकिन मनीष की खोज में बहुत कुछ देखा।

ईश्वर पर विश्वास नहीं इसलिए भगवान से मन्नत नहीं मांगी लेकिन यक़ीन मानिये एक प्रेमी जितना अपनी प्रेयसी को खोजता होगा उससे कम मैंने मनीष को नहीं खोजा।अजीब अजीब ख्याल ही आये थे. बिहार नेताओं का गढ़ है. यहाँ आठ साल से ऊपर के सभी मंझे हुए राजनेता होते हैं. शायद नेता बन गया हो. इसलिए गूगल पर मनीष, मनीष सिन्हा, मनीष कुमार सिन्हा,नवादा + बीजेपी, आरजेडी ,या कांग्रेस सर्च करता था. अजीब अजीब तरह से इंटरनेट खंगालता रहा. समय बीतता रहा, शादी कर लिया, दो बच्चे पैदा कर लिए.. फिर भी मनीष ज़ेहन में बना ही रहा.. 

2010 में फेसबुक पर ID बनाई. लगभग हर हफ्ते मनीष,मनीष कुमार,मनीष सिन्हा,मनीष कुमार सिन्हा,नवादा,पटना सर्च करता था. कई फोटो देखता था..शायद मिलता जुलता कुछ मिल जाय. इस तरह दिन महीने साल गुजरते रहे. जून 2020 में जब  हम सभी lockdown में अपने अपने घरों में क़ैद थे तब फेसबुक पर "people you may know " में मनीष दिखा. फोटो मिलगभग मिलती जुलती। शशांक के मित्र सूची में वो आ गया था इसलिए मुझे भी दिखने लगा. फोटो देखकर पक्का हो गया कि मनीष ही है तो धड़कन बढ़ गयी. मारे ख़ुशी के नाचने लगा. तुरंत मैसेज किया. नंबर दिया. मनीष ने भी तुरंत नंबर दिया.. बात हुई.. विशुद्ध भोजपुरी में. ये बताना ज़रूरी है कि मनीष की मातृभाषा भोजपुरी नहीं है. आतंरिक ख़ुशी का तर्ज़ुमा अगर काग़ज़ पर कर पाता तो पक्का एक अच्छे लेखक की श्रेणी में आ जाता.

मुलाकात में थोड़ी और देर हुई. आखिर दिसंबर 2020 में वो दिन आ ही गया. मुलाकात हुई और वो भी राकेश भाई के साथ जो हम दोनों के घनिष्ठ मित्रों में से हैं..

चित्र में क्रम से , मनीष - यह नाचीज़ - राकेश भाई



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