मंगलवार, सितंबर 17, 2019

नृत्यग्राम - नृत्य सीखने सिखाने का गाँव


अगर आपने ,जो जीता वही सिकंदर, फिल्म देखी होगी तो पूजा बेदी ज़रूर याद होंगी।पूजा बेदी के पिता कबीर बेदी हैं।लेकिन क्या आप जानते हैं उनकी माँ कौन थीं।उनकी मां का नाम है प्रोतिमा बेदी।प्रोतिमा बेदी भारत की मशहूर मॉडल थीं जो बाद में प्रख्यात ओडिसी नृत्यांगना बनीं।आप सोच रहे होंगे कि झाड़ झंखाड़ में विचरने वाला ये दुखी आत्मा नाच गाने की बात कैसे करने लगा।

तो क़िस्सा कुछ यूँ है कि...

मुझे नृत्य में कुछ खास दिलचस्पी कभी नहीं रही।बहुत छोटा था तब गाँव में लवंडा नाच देखने को मिलता था।यह नाच न तब मुझे पसंद आता था न अब।अलबत्ता जब धोबी नाच में धुधुकी के ताल और "सुपवा चलनिया कठवतिया ए बालम" के धुन पर जब उनका विदूषक नाचता था तब मजा आ जाता था और हम लोटपोट हो जाते थे।
छठी क्लास में जब शहर आये तब सरकारी स्कूलों में नृत्य कला नामक कोई चीज़ नहीं होती थी।आठवीं नवीं आते आते कुछ प्राइवेट स्कूल शहर में दस्तक दे चुके थे और उनका मुख्य आकर्षण पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी और सरस्वती पूजा के दिन होने वाला रंगारंग कार्यक्रम होता था।तब हमें भी उस रंगारंग कार्यक्रम का इंतज़ार रहता था।अपने स्कूल में "वर दे वीणा वादिनी वर दे" को निपटाकर और लड्डू खाते हुए किसी दूसरे स्कूल पहुँच जाते थे और नाच गाने का आनंद उठाते थे।"चुनमुनिया के माई, लइका लईकी दूनू पढाई", गीत पर थिरकते और इठलाते बालक बालिका भाव विभोर कर देते थे।

ग्यारहवीं बारहवीं का काल कला की दृष्टि से बहुत बोरिंग रहा।काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आकर थोड़ी हरियाली आयी।

‌बनारस में संकट मोचन मंदिर में हनुमान जयंती के अवसर पर एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है जहाँ देश विदेश के दिग्गज कलाकार, नर्तक, गायक, संगीतकार शिरकत करते हैं।एकदिन मेरे मित्र ने कहा आज संकट मोचन चलते हैं कुछ गाना बजाना देखा जाय।जब पहुंचे तो पता चला मंदिर के प्रांगण में घुसने की भी जगह नहीं।बाहर बड़ी बड़ी टीवी स्क्रीन लगीं थीं उसी में लाइव प्रोग्राम देख सकते थे। घोर निराशा के साथ लंकेटिंग(BHU गेट के पास के क्षेत्र लंका का बेवजह भ्रमण और नयन सुख लाभ) के लिए चल पड़े।जब रात गहराई तो एक बार फिर संकट मोचन गए।भीड़ छंट चुकी थी और वहां कोई नृत्य चल रहा था।पहली बार मैंने एक ऐसा नृत्य देखा जिसमे आँखें बोलती थीं।अंग प्रत्यंग की मुद्राएं भाव प्रदर्शन में सक्षम थीं।और वो नृत्य था ओडिसी।तब से मेरा ओडिसी से जान पहचान है।और बस जान पहचान ही है।
‌गूगल में एक दिन सर्च किया, "attraction within 50 kilometer"(पचास किलोमीटर के अंदर दर्शनीय स्थल)।कई नामों में एक नाम आया - नृत्यग्राम।नृत्यग्राम का गूगल रिव्यु देखा।ज़्यादातर लोगों ने शानदार कहा।कुछ निगेटिव रिव्यु भी थे।उनमें से ज़्यादातर ये थे कि रेसिप्शन पर बैठी बुढ़िया बड़ी खडूस है और कब नृत्यग्राम बंद मिले ये भी कह नहीं सकते।लेकिन ये सभी ने लिखा था कि वहां तक पहुंचने वाला रास्ता बेहद रमणीक है।मेरे यहाँ से दूरी 27 किलोमीटर गूगल बाबा ने बताया और साथ ही बताया एक घन्टा लगेगा जिसे मैंने मन ही मन डेढ़ घंटे कर दिया।
क़रीब 9 बजे हमारी सवारी चल पड़ी।यलहंका थाने से डोड्डाबल्लापुरा जाने वाली सड़क पकड़ी और CRPF हेडक्वार्टर से बाएं मुड़े।यह एक पतली सी बेहद घुमावदार सड़क है जिसके हर मोड़ पर बड़े बड़े शीशे लगे हुए हैं ताकि आपको पता चले कि सामने से भी कोई गाडी आ रही है।यह सड़क IIHR रोड कहलाती है।IIHR का मतलब इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ हॉर्टिकल्चर रिसर्च।इस रोड पर भारत सरकार के दो बेहद उत्कृष्ट संस्थान हैं।IIHR के बागान सड़क के दोनों तरफ हैं और शानदार दृश्य रचते हैं।बैंगलोर जैसे भयानक ट्रैफिक वाले शहर में एक ऐसी सड़क जिसपर ट्रैफिक नगण्य हो और दोनों तरफ अंदर तक तर कर देने वाली हरियाली हो।और क्या चाहिए।हमारा आना सफल हो चुका था भले ही नृत्यग्राम बंद मिले।

‌इस एरिया का नाम हेस्सरघट्टा है।हेस्सरघट्टा एक बड़ी झील भी है।झील के रास्ते में थोड़ा सा पहले सड़क बायीं ओर घूम जाती है और एक बेहद सूनसान हरी भरी लहराती हुई सड़क का रूप ले लेती है।इस सड़क पर 10 बजे दिन में भी कोई नहीं था और दोनों तरफ झाड़ियां थीं।लग ही नहीं रहा था कि यहाँ कुछ हो भी सकता है।अंदर थोड़ा डर भी था।तभी एक बोर्ड दिखाई दिया गवर्नमेंट फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट।फिर लगा यहाँ कुछ तो है।नृत्यग्राम का बोर्ड भी लगा था।ये बात पक्की थी गूगल बाबा सही दिशानिर्देश कर रहे हैं।

‌10 बजकर 15 मिनट पर हम नृत्यग्राम के गेट पर थे।

‌नृत्यग्राम गुरु शिष्य परंपरा की तरह चलने वाला एक ओडिसी नृत्य का स्कूल है।विशेष जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध है।संक्षेप में मैं यहाँ जानकारी साझा करूंगा।प्रोतिमा बेदी की एक बार मॉडल शूटिंग थी लेकिन गलती से ओडिसी नृत्य के ऑडिटोरियम में पहुँच गयीं।उन्होंने दो लोगों को ओडिसी नृत्य करते देखा और वो उसमें खो गयीं।उन्हें लगा यही हैं मेरी मंज़िल जिसकी मुझे तलाश थी।उन्होंने मॉडलिंग छोड़ दी, गुरु केलुचरण महापात्रा से ओडिसी सीखने लगीं और एक विख्यात ओडिसी नृत्यांगना के रूप में उनका पुनर्जन्म हुआ। उन्होंने नृत्य सीखने सिखाने की गुरु शिष्य परंपरा के तहत एक 'नृत्यग्राम' की स्थापना की।कर्नाटका सरकार ने उनके इस विशिष्ट कार्य के लिए ज़मीन लीज़ पर दी।10 एकड़ में फैला यह गाँव एक विशिष्ट शैली के स्थापत्य कला के लिए दर्शनीय है। कालांतर में उन्होंने नृत्य भी छोड़ दिया और अपना सारा कुछ मशहूर ओडिसी नृत्य कलाकार सुरुपा सेन को सौंप कर हिमालय भ्रमण के लिए निकल गईं।अपने हिमालय भ्रमण के दौरान ही वो लैंडस्लाइड के चपेट में आ गईं और उनकी मृत्यु हो गयी।

‌जब हम पहुंचे तो गेट पर 2 कारें भी थीं जो यहाँ भी कोई आता है का सबूत दे रहीं थीं।एक छोटा सा बोर्ड लगा है जिसपर लिखा है कि पहले ऑफिस जांय।जब गेट के अंदर घुसे तो एक छोटा मंदिर जैसा दिखा जो बाद में पता चला कि गुरु केलुचरण महापात्रा के स्मृति में बनवाया गया।पूरा परिसर ऐसा लगता है जैसे किसी सैकड़ों साल पुराने गाँव में आ गए हैं जिनकी इमारतें अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहीं है।इमारतों का यह डिज़ाइन भारत के जाने माने आर्किटेक्ट गेरार्ड दा कुन्हा  ने किया था।1990 में इसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था।यह सम्पूर्ण परिसर हराभरा तो है ही, शांति इतनी की आप अपने पदचाप भी सुन सकें।आफिस पहुंचे।एक महिला बैठीं थी।उन्होंने बताया कि प्रति व्यक्ति 100 रुपये देने होंगे।बच्चों की एंट्री फ्री है।जहाँ भी नृत्य के रिहर्सल चल रहे हैं उनका फोटो लेना मना है।इसलिए हम यहाँ एक भी फोटो नृत्य का नहीं लगा पाएंगे।
आगे बढे तो एक हॉल में सुरुपा सेन 4 नर्तकियों को सिखा रहीं थीं। हमें बहुत अच्छा लगा और हम बैठकर लगभग 20 मिनट तक देखते रहे।इस स्कूल की खूबी यही है कि आप नृत्य देख सकते हैं।बस उनका फोटो रिकॉर्डिंग मना है।जूते पहने सकते हैं लेकिन जूते पहनकर डांस फ्लोर पर नहीं चढ़ सकते।डांस फ्लोर अच्छे हैं।वहाँ पहुंचकर आप देख समझ पाएंगे कि नृत्य में एक एक शब्द की भाव मुद्रा कितनी मेहनत होती है।हम 20 मिनट तक "पंकज लोचन" शब्द पर आँखें कैसी होनी चाहिए, ये देखते रहे।वैसे ही क़रीब 10 मिनट तक "अद्भुत" शब्द पर नृत्य देखते रहे।कोई भी कला सीखने में कैसे उम्र गुजर जाती है एक झलक वहां देखने को मिला।वहां चार हॉल हैं और एक एम्फी थिएटर है।यह पूरी तरह एक आवासीय विद्यालय है।

‌इंटरनेट पर मिली जानकारी के अनुसार नृत्यग्राम अभी फण्ड की कमी जूझ रहा है इसलिए ओडिसी छोड़कर किसी भी नृत्य की शिक्षा अभी नहीं दी जा रही।योजना ओडिसी के साथ भरतनाट्यम, कथकली, कत्थक, मणिपुरी की शिक्षा की भी थी।आर्थिक मदद के लिए इसके कुछ हिस्से को होटल ताज ने एक रिसोर्ट की तरह विकसित किया था।उसका नाम "कुटीरम" है।अभी वह बंद मिला।शायद वो भी ठीक से चल नहीं पा रहा होगा।

‌हम वहां साढ़े बारह बजे तक आनंद विभोर हुए।वापस आते समय हेस्सरघट्टा झील भी गए लेकिन उसमें पानी बिलकुल नहीं था।इस साल बंगलोर में बारिश न के बराबर हुई है इसलिए सारे झरने सूखे हुए और झीलें भी।

‌फोटो लेते हुए खाते पीते ढाई बजे तक घर वापिस आ गए।

अब कुछ तस्वीरें देखिये


कुछ जगहें जहाँ फोटोग्राफी की जा सकती है.इसलिए यह फोटो आपको इंटरनेट पर हर जगह मिलेगा. 

गेट के पास लगा बोर्ड - ज़रूरी जानकारी
गेट के पास  

केलुचरण महापात्रा स्मृति मंदिर

ऑफिस के पास



सभी जगह ऐसे ही रास्ते हैं 




वहां बड़े बड़े पेड़ थे जिनमे ये फूल थे.नाम नहीं मालूम


एम्फीथिएटर

यहाँ एक कुआँ था.मजेदार बात एक तरफ घंटी एक तरफ बाल्टी.समझो..    


वहां शरीफे के पौधे भी थे..


शरीफा या सीताफल

वापसी  , गेट के पास

केलुचरण महापात्रा

गेट के सामने कुटीरम रिसोर्ट.एक नोटिस लगा था अगली सूचना तक बंद रहेगा. 

वहां तक जाने वाली सड़क

यही वो बोर्ड था जिसे देखकर हम समझे हम सही रास्ते पर हैं.

दो नहीं - चार बकरियां  

सर्वत्र सड़कें ऐसी ही हैं 

हेस्सरघट्टा झील की एंट्री.

झील पूरी तरह सूखी पड़ी है. 

IIHR रोड

IIHR

IIHR के बागान

IIHR रोड

और आखिर में IVRI
 - इति यात्रा 

गुरुवार, अगस्त 08, 2019

ऐतिहासिक फिल्म शोले का शूटिंग स्थल(रामनगरम) और गिद्ध अभयारण्य




"तुम्हारा नाम क्या है बसंती?"
"कितने आदमी थे"
"यहाँ से पचास-पचास कोस दूर जब बच्चा रात को रोता है तो माँ कहती है सो जा बेटे नहीं तो गब्बर आ जाएगा."
"इतना सन्नाटा क्यों है भाई"
"तेरा क्या होगा कालिया...सरदार मैंने आपका नमक खाया है... तो अब गोली खा"
"जेल में चक्की पीसिंग, एंड पीसिंग, एंड पीसिंग."
"बहुत कटीली नचनिया है"
"मेरा नाम सूरमा भोपाली एसे ही नहीं है."

अरे रे रे...आप सोच रहे होंगे कि मैं ये फिल्म शोले के डायलॉग्स धड़ाधड़ क्यों लिख रहा हूँ।तो मित्रों आज की ये पोस्ट इसी ऐतिहासिक फिल्म से सम्बंधित है।ये सारे अमर डायलॉग्स सलीम जावेद की जोड़ी ने फिल्म शोले के लिए लिखे थे।यह एक ऐसी फिल्म है जिसे मैं जब भी टीवी पर देखता हूँ थोड़ी देर तो ठहर ही जाता हूँ।इसका एक एक डायलॉग तो लोगों की ज़ुबान पर आज तक चिपके हुए हैं ही, एक एक चरित्र आज तक जीवंत है।छोटे से छोटा चरित्र भी अभी तक जेहन में है, याद कीजिये कौन याद नहीं आ रहा आपको, सूरमा भोपाली, अंग्रेजों के ज़माने का जेलर, मौसी, छोटे से रोल में सचिन, इमाम चाचा, कालिया, साम्भा, जेलर का जासूस वगैरह वगैरह सभी ऐसे याद आते है जैसे कल ही फिल्म देखकर आये हों।एक ऐसी फिल्म जिसे "हम आपके हैं कौन" फिल्म से पहले तक सबसे ज़्यादा पैसे कमाने वाली फिल्म का ख़िताब प्राप्त है।शोले के वीडियो कैसेट की तो रिकॉर्ड बिक्री तो हुई ही थी पूरी फिल्म के ऑडियो की भी रिकॉर्ड बिक्री हुई थी.जी हाँ सिर्फ गाने नहीं पूरी फिल्म का ऑडियो.फिल्म में एक कौव्वाली भी थी जो हटा ली गयी.

वैसे तो सबको पता है फिर भी बताता हूँ।जब यह फिल्म बनी तब 3 घंटे 24 मिनट की थी और अंत में ठाकुर गब्बर को मार देता है।जब यह रिलीज़ हुई तब 3 घंटे 14 मिनट की थी और अंत में गब्बर को पुलिस हिरासत में ले लेती है।यू ट्यूब पर दोनों ही वर्शन ऑफिशियली उपलब्ध हैं।

अब आते हैं असल मुद्दे पर।जब हम कुछ दिन पहले रंगनाथीट्टू बर्ड सैंक्चुअरी जा रहे थे तब रामनगरम रुके थे तब यकायक याद आया कि यहीं कहीं शूटिंग हुई थी शोले की।वक़्त मिलेगा तो चलेंगे।उस दिन तो वक़्त नहीं मिला।इस शनिवार को सोचा कहीं घूमने चलते है.बेटी से पूछा तो बोली ज़ू देखना है।शनिवार को उसका स्कूल था एक घंटे के लिए।11 बजे जब चलने लगे तो बोली उतना दूर नहीं जाना।थोड़ी इच्छा हमारी भी नहीं थी,नहीं गए।घर आकर प्लान बना कल यानि सन्डे को कहीं चला जाए।मेरी इच्छा थी शोले के शूटिंग वाली जगह देखने की और बेटी की ज़ू की।प्लान बना पहले शोले वाली जगह चलते है।वहां कुछ तो है नहीं।आधे घंटे रुकेंगे।और हाँ कभी आपने गिद्धों के अभयारण्य के बारे में सुना है?हम वहां भी चलेंगे.  फिर चल देंगे ज़ू की ओर।शाम तक ज़ू देखेंगे और वापसी।

जाने का रूट भी मैसूर रोड वाला न लेकर हेब्बाल, आउटर रिंग रोड, मगाडी रोड चंद्रप्पा रोड होते हुए मंचन्बेले और फिर अक्रावती नदी के किनारे किनारे रामनगर।

मैसूर रोड होते हुए मेरे यहाँ से दूरी 72 किलोमीटर है और इस रूट से 74 किलोमीटर।और फिर गाँव गिरांव से होकर ग़ुज़रने का मजा ही कुछ और है।मगाडी रोड छोड़ते ही पहाड़ियां साथ साथ चलती हैं और शानदार नज़ारा होता है।मंचन्बेले में एक वाटर रिजर्वायर भी है जो अक्रावती नदी को बांधकर बनाया गया है।यह जल संग्रह उस एरिया को पेय जल आपूर्ति करता है।मैप देखा तो सोचा वहां भी फोटो वोटो खींच लेंगे।

सुबह उठे 6 बजे।नहाते धोते नाश्ता करते 7:30 बज गए।7:45 पर हमारी सवारी चल पड़ी ।लगभग 9:30 बजे पहुंचे मंचन्बेले गाँव।वहां एक जगह ऊंचाई पर है जहाँ से डैम शानदार दिखेगा, ऐसा गूगल में लिखा था। हम भी उसी जगह रुके।टॉप पर गए और कुछ फोटो भी लिए। नीचे उतरते समय श्रीमती जी फिसल गयीं और जोरदार चोट लगी।पाँव में चोट अभी तक है।और हाँ डैम के पास जाना मना है।लेकिन अगर आप उनके संतरी को 50 रुपये देंगे तो वो गेट खोल देगा।हम नहीं गए।हिलटॉप से जो नज़ारा दिखेगा वो डैम से थोड़े दिखेगा।बालकों को भूख लग गयी और हम इडली ढूंढने लगे।डैम के एक गेट पर एक दुकान वाले से पूछा तो उसने थोड़ा पीछे जाने को बोला।हम पीछे के बजाय आगे बढ़ने की सोचे क्योंकि मैप रामनगर 35 मिनट बता रहा था।बालकों को मनाये कि आधा घंटा और रुक जाओ फिर रामनगर रोटी चावल वगैरह खाएंगे।बालक ने कहा वैसे तो आगे बढ़ो लेकिन मैं खाऊंगा इडली ही।हम आगे बढे।यही से सारा रास्ता अक्रवती नदी के किनारे किनारे है और नदी के पार हरी भरी पहाड़ियां हैं।नदी के किनारे नारियल और केले की भरपूर खेती दिखी।शानदार नज़ारे थे।हम उन नज़ारों को भर भर नज़र देखते बढे जा रहे थे।

मंचन्बेले से रामनगरम लगभग 20 किलोमीटर है।जब पास आये तो सड़क धूल भरी हो गयी और हम मैसूर हाईवे पर रामनगरम थे।यहीं से 2.5 किलोमीटर दूर शोले की शूटिंग वाली जगह है।पक्की सड़क बनी है।
रामनगर आते आते मुनमुन भूख से बेहाल हो गयी।फटाफट एक फलवाले के यहाँ से फ्रूट चाट लिए।फ्रूट्स जबरदस्त जायकेदार थे।सभी ने खाया।फिर जान में जान आयी।अब बारी थी रेस्टोरेंट ढूंढने की।आस पास कोई नज़र नहीं आ रहा था।गूगल किया तो वो लगभग एक दो किलोमीटर दूर बता रहा था।वहाँ एक पकौड़ी वाला था।उसके यहाँ पकौड़ियाँ खाईं गयीं।पानी पिए और रामदेवरा बेट्टा की ओर चल दिए।रुको भाई.. ये कहाँ चल पड़े, अभी तो शोले देखने जा रहे थे...तो भाई शोले देखने ही चलेंगे।दरअसल उस जगह का नाम रामदेवरा बेट्टा ही है।बेट्टा कन्नड़ा में हिल को कहते हैं।

12 बजे हम वल्चर सैंक्चुअरी(गिद्ध अभयारण्य) के गेट पर थे। ...अब फिर गड़बड़ किये...।...कहाँ जा रहा है बे...।तो फिर बताता हूँ, वो पूरा इलाक़ा गिद्धों का अभयारण्य है।कभी ढेर सारे गिद्ध रहते थे।अब काफी कम हो गए है।हमें एक भी नहीं दिखे।हाँ रास्ते में एक जगह सैकड़ों बाज देखे।फोटो लिया लेकिन अच्छे नहीं आये इसलिए बाजों का फोटो यहाँ नहीं लगाएंगे।अब क्योंकि यह सैंक्चुअरी है तो टिकट भी लगेगा।वयस्क 25 रुपये, बालक 10 रुपये स्कूटर के 10 रुपये।कुल 90 रुपये लगे।गेट से पार्किंग 700 मीटर अंदर है जो थोड़ी चढ़ाई चढ़कर है।यहाँ शोले फिल्म का कोई अवशेष नहीं रह गया है।बीबीसी के अनुसार फिल्म की शूटिंग खत्म होते ही गाँव को उजाड़ दिया गया था और बहुमूल्य सामानों को वहीँ बेच दिया गया।यहाँ दो फिल्मों की शूटिंग हुई है "शोले " और "पैसेज टू इंडिया".वहां वन अधिकारी के अनुसार इन दोनों फिल्मों से गिद्धों को बहुत नुकसान हुआ और उनकी संख्या में भारी घटोत्तरी हुई।

इस जगह को एक शब्द में कहूँ - मनोरम।मन शीतल कर देने वाला।रविवार होने की वजह से कुछ लोग भी थे अन्यथा बहुत कम लोग आते हैं यहाँ।जहाँ पार्किंग है वही पर शौचालय है।एक छोटी सी दुकान जिसपर चिप्स और पानी की बोतल थी।पहाड़ी पर एक बेहद सुंदर राम मंदिर है जिसकी सीढियां यहीं पार्किंग से शुरू होती हैं।पहाड़ों की सीढ़ियां बहुत तकलीफ देती हैं।400 सीढियां चढ़ने में हमारी हालात खराब हो गयी।मंदिर बेहद सुरम्य जगह पर है।मंदिर में भंडारा चल रहा था ।रसम और चावल।मंदिर के पास पीने का पानी उपलब्ध है और शौचालय भी है।मंदिर के बगल से ही रास्ता पहाड़ी की चोटी पर जाने वाला रास्ता है।500 मीटर हरी भरी चढ़ाई  चढ़ने के बाद एक खड़ी चट्टान है जो लगभग 200 मीटर होगी।उसे काटकर सीढियां बनाई गयी हैं और लोहे की रेलिंग लगाई गई है।यह बेहद रोमांचक है।ज़्यादातर लोग फिसलने के डर से नंगे पांव चढ़ रहे थे।हम तो जूते के साथ ही गए।बेटी भी चढ़ गयी।लोग उसे देखकर चकित थे, क्योंकि बच्चे तो थे लेकिन कोई भी डर के मारे ऊपर नहीं ले जा रहा था.।अगर आप जूते के साथ चढ़ रहे हैं तो बेहद सावधानी बरतें.जूते फिसलने वाले न हों.गिर गए तो इहलीला तो समाप्त नहीं होगी लेकिन शरीर छिन्न भिन्न ज़रूर होगा.

ऊपर पहुंचे तो अद्भुत नज़ारा था। एक पानी का कुंड भी था.वैसे तो जबसे यहाँ आया हूँ ठंडी हवा से परेशान हूँ.लेकिन ऊपर ये हवा आंधी की तरह लग रही थी.बेटी तो बोली मैं तो उड़ ही जाउंगी.खूब सारे फोटो लिए.आधे घंटे रुके.

अब बारी उतरने की थी.उतरना ज़्यादा चैलेंजिंग था.जब मुनमुन उतरने लगी तो नीचे के लोगों के लिए किसी सेलेब्रेटी से कम नहीं थी.लोग धड़ाधड़ फोटो ले रहे थे.दो लोग हमारे लिए ऊपर आये और बेटी को उतरने में मदद किये.धन्यवाद सभी का.नीचे आते आते 2 :15  बज गए. ज़ू जाना संभव नहीं था.बेटी भी किसी और दिन जाने के लिए तैयार हो गयी.भूख ज़ोरों की लगी थी.वापस लौटे.अबकी बार मैसूर रोड लिए.प्लान किये जो सबसे पहला ढाबा दिखेगा उसी में खाना खाएंगे.2:45 पर पहुंचे "De Parathzzaa Cafe ". बढ़िया रोटी चावल पनीर और दाल खाये.इडली यहाँ नहीं मिली.3:30 पर यहाँ से चले और 5:45 पर घर.अब थोड़े चित्र देखिये।


मगाडी रोड से बाएं मुड़ने के बाद एक गाँव के बाहर एक मंदिर

मंचनाबेले जल संग्रह


मंचनाबेले जल संग्रह

मंचनाबेले जल संग्रह को देखने हिल टॉप पर जाते हुए 

मंचनाबेले जल संग्रह को देखने हिल टॉप पर जाते हुए 


इस कमल के तालाब का फोटो मुनमुन के कहने पर लिया गया

रामनगरम  जाने का रास्ता अक्रावती नदी के किनारे किनारे

रामनगरम  जाने का रास्ता अक्रावती नदी के किनारे किनारे


और ये पहुंचे रामनगर..यहाँ हमने फ्रूट चाट खाये . और सामने हनुमान जी हैं उनके नीचे से शोले की शूटिंग वाली जगह का रास्ता जाता है.

 हनुमान जी हैं उनके नीचे से शोले की शूटिंग वाली जगह का रास्ता जाता है.

पहुँच गए

रामदेवरा बेट्टा गिद्ध सैंक्चुअरी के जानकारी


राम मंदिर जाने का द्वार - यहाँ से 400 सीढ़ियों के ऊपर मंदिर है. 

मंदिर की ओर चढ़ती हुई सीढ़ियां

मंदिर की ओर चढ़ती हुई सीढ़ियां

मंदिर के थोड़े पास.

मंदिर के पास से लिया गया चित्र

और ये रहा राम मंदिर

ये पास में एक खूबसूरत विश्राम स्थल है 

चोटी पर जाने के रास्ते में 


चोटी पर जाने के लिए बनी बेहद खतरनाक सीढ़ियां.ज़्यादातर लोग यहाँ आकर लौट जा रहे थे.

और ये पहुंचे चोटी पर

चोटी से नीचे का दृश्य


चोटी पर एक छोटा तालाब 


चुन्नू बाबू बमुश्किल अपना फोटू खिंचवाते हैं.

चोटी से रामनगरम 




बाप रे... पेट मटका बनता जा रहा है.आज समझ आया..





यह एक और हिल है पास में.कहते हैं गिद्धराज जटायू रावण से लड़ते लड़ते उसी पर गिर पड़े थे. वहां एक मंदिर भी है.झंडी तो आपको दिख रही है.वहां जाना कठिन हैं और मना भी. कारण, अभी हाल ही में एक प्रेमी युगल कूदकर....

उतरने की तैयारी


उतरने लगे . दो लोग नीचे से ऊपर चुन्नू मुन्नू की मदद करने आ रहे हैं.



आस पास की हरियाली





मंदिर सामने से.एक बात मैंने गौर किया है.यहाँ कर्णाटक में राम और हनुमान मंदिर बहुत हैं जबकि तमिलनाडू में नहीं या बेहद कम..इसका मतलब ये कि राम का प्रभाव इस इलाके में ज़्यादा था.

मंदिर से नीचे की ओर जाती हुई वही सीढ़ियां..



गिद्ध तो दिखे नहीं लेकिन वहां बने सूचना केंद्र से कुछ चित्र ज़रूर ले लिए.








ये सारे चित्र वहीं के हैं.मतलब वहां हाथी..तेंदुआ और भालू भी पाए जाते थे..


यहाँ पर पेट पूजा..खाना बहुत अच्छा था..और जगह तो आप देख ही रहे हैं..

रेस्टोरेंट के पास-हमारी दोनों स्कूटियां...


और ये रहा हिलटॉप का वीडियो..

अगर आप शोले देखने जा रहे हैं तो निराश होंगे..लेकिन जगह शानदार है..इसलिए ज़रूर जाइये..शोले फिल्म एक बार देखकर जाइये..कुछ पहाड़ियां पहचान में आ जाएँगी..चुनु मुन्नू तो रोज़ आजकल अंग्रेज़ों के ज़माने वाला जेलर और सूरमा भोपाली -  दृश्य देखते हैं और खूब हँसते हैं..

-इति यात्रा