गुरुवार, सितंबर 06, 2012

एक शेर और एक कविता

अब तो जाते हैं मयकदे से मीर,
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया।

एक कविता

ध्यान में आक बैठ गये हो तुम भी न...
मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी न...
इश्क ने यूं दोनों को हमआमेज किया...
अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी न...
कर जाते हो कोई शरारत चुपके से...
चलो हटो तुम बहुत बहुत बुरे हो तुम भी न...
मांग रहे हो रूखसत मुझसे...
और खुद भी हाथ में हाथ लिए बैठो हो तुम भी न...
खुद ही कहो अब कैसे संवर सकती हूं मैं...
आईने में तुम भी होते हो तुम भी न...
दे जाते हो मुझको कितने रंग नए...
जैसे पहली बार मिले हो तुम भी न...

--अमरीन हसीब अंबर 

ये हम जो शहर के पास अपना गाँव बेचते हैं
यक़ीन कीजिये हाथ और पाँव बेचते हैं

ये तुम जो मुझसे मुहब्बत का मोल पूछते हो
तुम्हें ये किसने कहा पेड़ छाँव बेचते हैं

-अब्बास ताबिश


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