बुधवार, नवंबर 16, 2011

जीवन-दर्शन



स्याह रात है साया तो हो नहीं सकता,
फिर ये कौन है जो साथ-साथ चलता है



घर  घर  दोलत  दीन  ह्वै,  जन जन जाँचत जाय|
दिए लोभ चश्मा चखनि , लघु पुनि बड़ो लखाय।|

रविवार, नवंबर 06, 2011

नर हो न निराश करो मन को

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो ।
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो ।
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।।

संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना ।
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहां
फिर जा सकता वह सत्त्व कहां
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो ।
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे ।
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।।

(मैथली शरण गुप्त)

रविवार, अक्टूबर 30, 2011

हमारी अंटरिया पे आजा रे संवरिया


हमारे एक सीनियर राजीव श्रीवास्तव हैं.कॉलेज के दिनों में उनका एक जबरदस्त गाना था जिसके बिना कोई भी प्रोग्राम अधूरा रहता था.
स्मरण के आधार पर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

हमारी अंटरिया पे आजा रे संवरिया
देखा देखि तनिक होई जाए.
नैन लड़ जइहें, नज़र मिल जइहें 
सब दिन का झगडा ख़तम हो जाए.

हम तो हैं भोले जग है जुल्मी
इश्क को पाप कहत हैं अधर्मी,
जग हंसिहें तो कुछ न होइहें
तू हंसिहौं तो जुलम होई जाए.

हमारी अंटरिया पे आजा रे संवरिया
देखा देखि तनिक होई जाए.

कसौली और चंडीगढ़

यह यात्रा 2011 में कभी की गयी थी 














जगजीत सिंह की याद में...


"उन्हें ये जिद कि मुझे देखकर किसी को न देख.
मेरा ये शौक कि,सबसे कलम करता चलूँ.

इधर से गुज़रा था सोचा सलाम करता चलूँ.
हुज़ूर आपका भी एहतराम करता चलूँ."

"ये बता दे मुझे जिंदगी
प्यार की राह के हमसफ़र 
बन गए किस तरह अजनबी
ये बता दे मुझे जिन्दगी."

"तेरी नज़रों से गिराने के लिए जाने हया.
मुझको मुजरिम भी बना देंगे तेरे शहर के लोग."

"दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला."

    ...........

मंगलवार, अगस्त 23, 2011

चेन्नई डायरी

आजकल चेन्नई में हूँ..चेन्नई से जुडी कुछ बातें बताता रहूँगा..

 काफी खोजबीन के बाद आज मैंने हिंदी अख़बार "राजस्थान पत्रिका" चेन्नई में ढूंढ निकाला(२४-०८-११).
आपने किसी गाडी को धक्का लगते देखा है?देखा ही होगा..आप कहेंगे ये तो आम बात है..लेकिन अगर मैं ये कहूं  की आपने ट्रेन को धक्का लगते देखा है तो आप क्या कहेंगे?मेरा दिमाग सनक गया है..लेकिन नहीं..भारत में एक ऐसा भी रेलवे रूट है जहाँ ट्रेन को धक्का लगाना पड़ता है.जी हाँ.ये स्टेशन इटारसी से नागपुर के बीच पड़ता है.धाराखोह-ये स्टेशन एक छोटा सा स्टेशन है.लेकिन आप यहाँ 4 -5 ट्रेन के इंजिन देख सकते हैं..दरअसल यहाँ सभी ट्रेन में 2  इंजिन जोड़ दिए जाते हैं ..वो भी पीछे से.और ट्रेन को धक्का लगाते हैं.भाई जबरदस्त चढ़ाई जो है.बेचारा एक इंजिन ट्रेन को खींच नहीं पाता.फिर ये दोनों इंजिन अगले स्टेशन -मरमझिरी में अलग कर दिए जाते हैं.चाहे कोई भी ट्रेन हो यहाँ रूकती जरूर है.हैं न मजेदार बात.. 

शुक्रवार, अगस्त 19, 2011

जीवन की आपाधापी में

एक अरसा गुजर गया कुछ लिखे हुए.
इसलिए..मन की अभिव्यक्ति को बच्चन जी एक मशहूर कविता द्वारा व्यक्त कर रहा हूँ.
 
जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोंच सकूँ,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिस दिन मेरी चेतना जगी मैने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले मे
कुछ देर रहा हक्का बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ़ से आया ही तो धक्का-सा
मैने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अन्दर से उबल चला,

जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा-भला।
मेला जितना भडकीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज़ ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्डे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी,
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।

जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोंच सकूँ,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा-भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पडे ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा--
नभ ओले बरसाये, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खडा था कल उस थल पर आज नही,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फ़ैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।

जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोंच सकूँ,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या भला-बुरा।
 
 

शनिवार, अक्टूबर 30, 2010

रहमान मियां..

जहाँ तक बस जाती है वहां से मेरा गाँव एक-डेढ़ किलोमीटर दूर है.पैदल जाना पड़ता है.एक बार ऐसे ही पैदल जाते हुए ,गाँव से थोड़ी दूर पर साथ चलते हुए एक चेहरे पर नज़र पड़ी.बूढा शरीर ,बाल सफ़ेद ,काँख में छाता लिए,छोटा कुरता और और घुटने से ऊपर की मैली धोती पहने.पहचानने में देर नहीं लगी-ये थे हमारे ही गाँव के रहमान मियां.

मैंने उन्हें प्रणाम किया-पालागी बाबा .रहमान मियां बोले खुश रहो बेटा ,कौन हो पहचान नहीं पाया,आँखें कमजोर हो गयी हैं.मैंने अपना परिचय दिया-बोले-अरे संजे..का हाल बा बचवा..बाबूजी कैसे हैं..बाल-बच्चे?सब कुशल मंगल?भैया कैसे हैं.घर के सभी सदस्यों का हाल चाल इतनी आत्मीयता से शायद खुद घरवाले भी नहीं पूछते."बेटा..नगीना-मुन्नी भैय्या चले गए,तुमलोग शहर रहने लगे..साथ छूट गया..नहीं तो....."

यही सब कहते सुनते गाँव आ गया और मैंने अपने घर की और रहमान मियां ने अपने घर की गली पकड़ ली.आप सोच रहे होंगे कि मैं ये बेतुकी बात क्यूँ कर रहा हूँ..ऐसा तो होता रहता है.मैं आपको याद दिला दूं कि अभी कुछ दिन पहले भारत में एक ऐतिहासिक न्यायिक फैसला हुआ.जी हाँ ..बाबरी मस्जिद - राम मंदिर का..दूसरे शब्दों में - अयोध्या विवाद .रहमान मियां उसी की एक बानगी हैं.ऐसा नहीं कि कहानी नई है.बस पात्र बदल रहा हूँ.

जब हम छोटे थे ,हमें किसी ने नहीं सिखाया कि ये मियां हैं इसलिए इनसे बात नहीं करनी.इनसे मिलना जुलना मना है.रहमान मियां और मेरे बाबा(दादाजी) पक्के दोस्त थे.हम रहमान मियां को भी बाबा ही बुलाते थे और पैर छूकर प्रणाम करते थे.जब हमारे मामा ने आंटे और तेल की चक्की खोली थी तब रहमान बाबा ने अपना घर दिया था.हर छोटे बड़े काम में दोनों परिवार साथ होते थे.बात सिर्फ दो परिवारों की नहीं..समूची मुस्लिम बिरादरी दशहरे का आनंद उठाती और सभी हिन्दू पूरे शिद्दत से ताजिया के दिन "या-हुसैन" बोलते थे.

फिर हम थोड़े बड़े हुए.और शहर आ गए.नुक्कड़ों पर उमा भारती के भड़कीले भाषण बजने लगे.रामायण के मर्यादापुरुषोत्तम राम की छवि "युधवीर" की होने लगी."कसम राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं बनायेंगे" के कैसेट हर जगह बजने लगे.युग का विघटन आरम्भ हुआ और हुआ-6 दिसम्बर 1992 को देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक विध्वंस.एक दार्शनिक ने यहाँ तक कहा"निहत्थी ईमारत पर आघात देश का क्रूरतम अध्याय है.इससे सिर्फ ईमारत ही नहीं,बुद्ध और महात्मा की सामाजिक और सांस्कृतिक ईमारत भी ढह गयी."समाज बंट गया.नए हिन्दू मुस्लिम बच्चे एक दूसरे को नफरत की निगाह से देखने लगे.दोस्ती ख़तम हो गयी.अमन चला गया.दिलों में दीवार बन गयी.अयोध्या की आग आम आदमी तक पहुँची.गाँव की गली गली गरम हो गयी.जिस "शहीद बाबा" पर हम हिन्दू जाकर माथा टेकते थे अब वो पत्थर का रोड़ा नज़र आने लगा.ताजिया के चबूतरे को लोगों ने तोड़ डाला.अयोध्या में 2000 लोग मारे गए लेकिन लाखों रहमान मियां का खून हुआ."Integrity in diversity " और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता तार-तार हो गयी.

रहमान मियां अब भी हैं.अब वो रहमान बाबा या रहमान भाई न होकर रहमान मियां हो गए.दरजी मोहल्ला न होकर "कटुआ" मोहल्ला हो गया.ओफ्फ्फ..

समय बदला.रंजिशों पर परदा पड़ा.भूमंडलीकरण के युग ने लोगों को नजदीक किया.अयोध्या का ऐतिहासिक फैसला आया.फैसला चाहे जो भी हो...आपसी रंजिशों की गुंजाइश न हो,हर तरफ अमन हो हम यहीं चाहते हैं.या यूँ कहें..

" शायर हूँ कोई ताजा गज़ल सोच रहा हूँ,

मस्जिद में पुजारी हो मंदिर में मौलवी,

हो किस तरह मुमकिन ये जतन सोच रहा हूँ। "

आओ सभी मिलकर कहें -

आमीन !!!!

अंगूरी में डसले बिया नगिनिया...

ये गाना सुनना है...नीचे का लिंक क्लिक कीजिये..  
 

बुधवार, सितंबर 15, 2010

हिंदी ज्ञान

नीचे एक कहानी का कुछ अंश है.बताइए कहानी और कथाकार का नाम ..


जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिमान समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को पहले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याही हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है, किन्तु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी नहीं दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता है, पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर स्थाई विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुःख, हानि-लाभ किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं, पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर!